VIDEO: गरीब़ों पर कोरोना से बड़ा नगर निगम के तोड़ू दस्ते का क़हर..लॉकडाउन में बंद दुकानदारों की छीन ली रोज़ी – रोटी..जागो सरकार…ऐसे दस्ते को ईनाम देकर कोई बड़ी ज़िम्मेदारी सौंप दो

(गिरिज़ेय)।आपदा में अवसर की बात करने वालों के लिए बिलासपुर नगर निगम ने एक अच्छी मिसाल पेश की है । एक तरफ कोरोना नाम की महामारी गरीबों की रोजी -रोटी छीन रही है । लॉकडाउन में पूरे शहर के साथ सड़क किनारे की छोटी-छोटी दुकानों में भी ताला बंद है ।  कोई इस बात की फ़िक्र करने वाला नहीं है कि इन कमजोर लोगों के घर में चूल्हा कैसे ज़ल रहा होगा…..?  लेकिन कोरोना से बड़ी मार नगर निगम की नजर आ रही है । जिसने लॉकडाउन का फायदा उठा कर छोटी-छोटी दुकानों को सड़क किनारे से हटाते हुए उस पर स्मार्ट सिटी की गुमटियां रखने का अभियान शुरू किया है। हालत की कल्पना कोई भी कर सकता हे कि लॉकडाउन के समय अपने घर में बैठकर आने वाले कल की फिक्र के साथ घुट – घुट कर जिंदगी बिता रहे किसी गरीब आदमी को यदि खबर मिलेगी कि उसकी दुकान बंद तो है….. लेकिन अब वह ल़ॉकडाउन के बाद भी नहीं खुल सकेगी तो उस आदमी पर क्या बीतेगी…. ।  लेकिन बिना मुरव्वत के बेरहमी  से नगर निगम के तोड़ू  दस्ते ने शुक्रवार को दोपहरी में मुंगेली रोड पर यह कारनामा कर दिखाया । इतना ही नहीं भीड़ भाड़ के माहौल में चल रहे नगर निगम के इस अभियान को कव़र करने गए पत्रकार के साथ भी निगम के दस्ते ने बदसलूकी कर दी ।

इन दिनों दुनिया भर में फैल रही कोरमा महामारी का क़हर कितना बेरहम है ……इसे सभी महसूस कर रहे हैं । इस भयंकर आपदा के समय छोटे -बड़े सभी लोग इस कोशिश में हैं कि हम कैसे किसी की मदद सक उसे संकट में उबार सकते हैं ।  लेकिन बिलासपुर नगर निगम का प्रशासन और तोड़ू दस्ता उल्टी चाल चल रहा है ।  स्मार्ट सिटी के नाम पर सड़क किनारे गुमटियां लगाने के लिए नगर निगम के दस्ते को आपदा के इस दौर में बढ़िया अवसर मिला है ।  जिसका पूरा फायदा उठाते हुए शुक्रवार को दोपहर लाव – लस्कर के साथ नगर निगम का दस्ता मुंगेली रोड पर श्रीवास भवन की ओर जाने वाले तिराहे के पास यह अभियान शुरू करने पहुंचा।  लॉकडाउन के दौर में जब पूरी सड़क खाली है और सड़क़  किनारे रोज़ कमाने खाने वालों की दुकानें भी बंद हैं । वैसे समय में नगर निगम के अमले ने छोटी-छोटी दुकानों को बेरहमी से हटा दिया । किसी तरह इन दुकानदारों को नगर निगम के इस अभियान की खबर लगी तो लॉक डाउन की पाबंदियों के बावजूद  अपनी रोजी-रोटी की चिंता करते हुए गरीब -गुरबा लोग मौके पर पहुंचे। उन्हें एक लाइन का आर्डर दिया गया कि जगह खाली करना है। आनन-फानन में एक दूसरे की मदद कर गरीबों ने अपनी  रोजी रोटी का ठिकाना अपने ही हाथ से तोड़ मरोड़ कर वहां से हटा दिया। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह गुमटियां सड़क किनारे उस जगह पर रखी गई है ,जिसे खुद नगर निगम ने लोगों के पैदल चलने के लिए सुव्यवस्थित और साल – डेढ़ साल पहले ही इस फुटपाथ पर टाइल्स लगाई गई है। गरीबों को उजाड़ कर ही अगर स्मार्ट सिटी का गिफ्ट इस शहर को दिया जा रहा है ….तब तो यह इसे स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं…. इस पर लोगों को जरूर विचार करना चाहिए।

इन दिनों लॉकडाउन के दौर में अपने – अपने घरों के भीतर कैद लोग केवल इस बात की चिंता कर रहे हैं कि कोरोना महामारी का कहर आगे किस रूप में जारी रहेगा या उससे कभी राहत मिलेगी।और महामारी की इस मार से कमाई – धमाई पर क्या असर पड़ेगा….. ? इस बारे में सोचकर बड़े – बड़े लोगों की हालत खराब है…।तो गरीबों की हालत का अँदाजा लगाया जा सकता है। ज़िनके सामने अपनी रोजी – रोटी का भी बड़ा सवाल है। कोई भी कल्पना कर सकता है कि अगर ऐसे समय में किसी गरीब के सामने ऐसी सूरत पेश हो कि लॉक डाउन का दौर गुजर जाने के बाद भी वह अपनी छोटी सी दुकान नहीं खोल सकेगा तो उस पर क्या बीतेगी। इस नजरिए से देखें तो नगर निगम प्रशासन कोरोना से भी बड़ा संकट गरीबों के सामने खड़ा कर रहा है। यकीनन यह फैसला नगर निगम के तोड़ू दस्ते का नहीं है । उसे तो जिम्मेदारी दी गई होगी। लेकिन प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों ने अगर यह फैसला किया है तो उंगलियां उनकी ओर भी उठेंगी । उन्हें इस बात का भी एहसास होना चाहिए की उनका अमला कितना बेरहम और क्रूर है। जिसने कोरोना से भी आगे बढ़कर गरीबों की रोजी रोटी छीनने में कहीं रहमदिली  नहीं दिखाई। हो सकता है अपने घरों में कैद रहकर यह गरीब  कोरोना से अपने आपको बचा लें। लेकिन नगर निगम के अमले की बेरहमी से बचाने वाला कोई नहीं है। इस शहर में इस समय रामशरण यादव जैसे संवेदनशील और गरीबों के हित को हमेशा सर्वोपरि रखने वाले महापौर का नेतृत्व मिला हुआ है। गरीबों के बीच हमेशा सक्रिय रहने वाले शेख नसीरुद्दीन जैसे सभापति हैं। लेकिन प्रशासन में बैठे अफसरों के आर्डर पर नगर निगम का अमला गरीबों पर जिस तरह कहर ढा रहा है । उससे पूरे संस्थान की छवि  पर भी आंच आ रही है । लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जनता के बीच से चुनकर गए प्रतिनिधि गरीबों के दर्द को महसूस भी करते हैं और उनके साथ लॉकडाउन के समय हो रही दोहरी ज्यादती को रोकने के लिए कोई सार्थक कदम भी उठाएंगे।

नगर निगम के तोड़ू  दस्ते के इस अभियान के दौरान कवरेज करने पहुंचे इस रिपोर्टर के साथ भी दस्ते ने बदसलूकी की। जिस जगह पर कार्यवाही की जा रही थी वह जगह रिपोर्टर के घर के काफी नजदीक है। हो हल्ला  और भीड़ देखकर हालात का पता लगाने जब रिपोर्टर पहुंचा और कवरेज करने लगा तो नगर निगम के दस्ते में शामिल प्रमील शर्मा ने रिपोर्टर के साथ भी बदसलूकी की। यह बात सही है की नगर निगम का अमला अपने ऊपर के अफसरों के हुक्म का पालन कर रहा था और अपनी ड्यूटी पूरी कर रहा था । लेकिन लॉकडाउन के दौरान जब सड़कें सूनी हो तब 20 – 25 की संख्या में कुछ लोग जमा होकर उठा –पटक में लगे हो तो एक पत्रकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। पत्रकार ने भी अपनी ड्यूटी समझ मौके पर पहुंच कर हालात को समझने – बूछने की कोशिश की। लेकिन लॉकडाउन का नाम लेकर रिपोर्टर को कवरेज करने से रोका गया।अगर नगर निगम प्रशासन अपने तोड़ू दस्ते को इतना अधिकार सम्पन्न और ताक़तवर बनाकर ज़मीन पर उतारता है…. तब तो ऐसे सक्षम – सबल – हिम्मतवर- दबंग- लोगों को पुरस्कृत कर नगर निगम को ऐसे कामों में भी लगाना चाहिए , जो दूसरे लोगों से संभल नहीं रहे हों…..।कोरोना के इस दौर में सिस्टम को ऐसे ही सक्षम और बेरहम लोगों की दरक़ार है…..। वे किसी की परवाह किए बिना बड़े से बड़े काम कर सकते हैं….।

 हालांकि किसी रिपोर्टर या शहर के आम आदमी को यह पूछने का शायद अधिकार नहीं है कि लॉकडाउन के बावजूद गरीबों की छोटी-छोटी दुकानें तोड़ने के लिए इतनी बड़ी संख्या में पहुंचे लोगों के इकट्ठा होने की अनुमति लॉकडाउन में है या नहीं……?  क्या लॉकडाउन में बंद किसी गरीब़ की दुकान को हमेशा के लिए बंद कर देने का भी अधिकार शासन – प्रशासन को मिल गया है। क्या दुकानदारों को हटाने से पहले नोटिस दी गई है……? क्या दस – पन्द्रह साल से भी अधिक समय से इसी सड़क के किनारे छोटी सी दुकान लगाकर अपनी ज़िंदगी बसर करने वाले लोगों को हटाकर दूसरे लोगों को उनके सामने गुमटियां मुहैय्या कराना न्यायसंगत लगता है….?  सरकार और प्रशासन को जितने अधिकार मिले हुए हैं , उसे सामने देख कर कोई भी व्यक्ति शायद व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों से यह सवाल पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता। लेकिन रिपोर्टर की ड्यूटी तो सच सामने दिखाना है। अगर व्यवस्था के प्रमुख पदों पर बैठे लोगों के अंदर संवेदनशीलता हो और वह नगर निगम के इस दस्ते की ओर से चलाए जा रहे अभियान पर कुछ सवाल जवाब कर सकें तो यह उनके विवेक पर निर्भर है। हमने तो अपना काम कर दिया…….। बाकी……जिनके हाथ में व्यवस्था की कमान है अब वे अपना जाने।।

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