नए मंत्री Brijmohan Agrawal से शिक्षकों को है कैसी उम्मीदें…?

Shri Mi
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सरगुजा(मनीष जायसवाल)मोदी की गारंटी में बनी भाजपा सरकार में अब स्कूल शिक्षा विभाग और उच्च शिक्षा विभाग की कमान भाजपा के सबसे अनुभवी नेता Brijmohan Agrawal के हाथ में है। उनके अनुभव की शुरुवात 90 के दशक से चुनावी जीत के साथ शुरू होती है।

स्कूल शिक्षा विभाग की जगह पंचायत विभाग में भी शिक्षा कर्मियों की भर्ती का काल खंड यही था।Brijmohan Agrawal अविभाजित मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे उसके बाद डॉ रमन सिंह की सरकार में 15 साल लगातार मंत्री रहने के बाद सत्ता वापसी कर पांच साल बाद विष्णु देव साय सरकार में फिर एक बार मंत्री बने है। उनके सामने कई चुनौतियां है। वे नवाचारी रहे है…। उनके लोक निर्माण विभाग के नवाचार कभी सुर्खियों में रहे है…।

एक आम मान्यता बन गई है जिसे जमीन से जुड़े बृजमोहन अग्रवाल शायद इत्तेफाक रखते हो होंगे …! इस विभाग में रणनीतिकारों की एक खासियत रही है ..।

छात्र से लेकर शिक्षक तक के उज्वल भविष्य के लिए योजना गाजर का हलुवा बता कर बनाई जाती है। शुरुवात में जायका भी हलुवा जैसा स्वादिष्ट होता है ..! योजनाएं जब व्यवस्था से निकल कर जब बाहर आती है, उसका दायरा बढ़ता है …।

फिर व्यवस्था के जिम्मेदार लोगो में से हर कोई कुछ और नया प्रयोग करते हुए कुछ सामग्री घटा बढ़ा देता है। जिससे कुछ समय बाद गाजर के हलवे की नमकीन खिचड़ी बन जाती है..। मजबूरन योजनाओं को बंद करना पड़ता है। इस बात को 600 रुपए से स्कूल विभाग में सेवा दे रहा शिक्षक और हिंदी मीडियम से अंग्रेजी मिडियम के लिए जंप किए छात्र अच्छी तरह समझते है ।

मोदी की गारंटी में बनी भाजपा सरकार के समाने कई चुनौतियां है।स्कूल शिक्षा में बृजमोहन चूंकि अनुभवी हैं इसलिए उन्हें इस विभाग के बारे में सब कुछ पता है।लेकिन अब स्थितियां बदल गई है। उन्होंने अब तक मंत्री रहते हुए कई विभागों को संभाला है। इस बार वे आठवीं बार विधायक चुने गए हैं।

उन्हें जानकारी होगी जिसकी चर्चा आम है कि बीते पांच साल लोक शिक्षण में सबसे अधिक अफसरशाही का बोल बाला था। इस विभाग के एक बड़े अफसर की जबान पत्थर की लकीर बना दी गई। जिसका फायदा यह हुआ कि यह विभाग कुछ मामलों में अवार्ड विनिंग विभाग रहा। लेकिन जिन कार्यों के लिए अवार्ड मिला उसकी जमीनी सच्चाई उस अवार्ड से मेल नहीं खाई। जिसे लेकर पूर्व विपक्ष भी हमलावर रहा है।

स्कूल शिक्षा विभाग कि यह खासियत रही है कि जीत के आगे किसी का डर भी मायने नहीं रहा है..! जिसकी झलक छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसलों को अमल में न लाने के रूप में देखी गई है। अधिकारी अपनी जीत के लिए अभिमत के आधार पर निर्णय लेते रहे है।कई मामलों में कई बार विभाग को और अवमानना की स्थिति का समाना करना पड़ा। 

आज भी कई मामले कोर्ट से निराकृत कर दिए जाने के बाद भी उन मामलों पर निर्णय लिये जाने को लेकर लोक शिक्षण विभाग गंभीर नहीं रहा है। ऐसे कई लंबित मामलों की वजह से

कई अफसरों और शिक्षको को सिर्फ दस्खत करने की तनखा दी जा रही है। 

व्यवस्था की जिम्मेदार लोगस्कूल शिक्षा विभाग की भरती पदोन्नति संशोधन प्रक्रिया में आई अड़चनों को सरलता से सुलझा सकते थे। लेकिन अपने अफसर शाही रवैया की वजह से व्यवस्थाओं को बाधित किया गया। जिसका खामियाजा शिक्षको के साथ साथ छात्रों को भी उठाना पड़ा है। 

 ऐसी स्थिति की नौबत शायद अब ना आए क्योंकि अब स्कूल शिक्षा की कमान बृजमोहन अग्रवाल के अनुभवी के हाथो में है । इस कालखंड में सत्ता वापसी का मजबूत आधार आरएसएस और पार्टी संगठन मोदी की गारंटी की वजह से राज्य बनने के बाद अब सबसे अधिक मजबूत भी हुआ जिससे अब सुशासन उम्मीद भी सबको अधिक है।

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