अंतःसलिला अरपा के तट पर विदेशी सीखते हैं संस्कृत

SANSKRIT(भास्कर मिश्र)बेकार का प्रश्न है कि बिलासपुर में पाणिनी व्याकरण और शोध संस्थान की उपयोगिता क्या है। फिर प्रश्न होगा कि महानगरों के लोग पाणिनी और संस्कृत को क्यों पढ़ें। शायद फिर एक प्रश्न और भी खड़ा हो जाएगा कि अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पैनिश, पुर्तगीज, हिब्रू, अरबी और अन्य भाषा भाषी देश संस्कृत को क्यों पढ़े। इसकी उपयोगिता क्या है। मेरी नज़र में यह अतार्किक सवाल होगा। भाषा का महत्व हमेशा से रहा है और रहेगा। खासतौर पर संस्कृत भाषा का । दुनियां को जब भाषा का ज्ञान नहीं था तब भारत में संस्कृत भाषा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। सुकरात, प्लूटो, को भारत वर्ष की जानकारी नहीं थी। अन्यथा इस भाषा को आज पूरी दुनियां नमन करती। दुर्भाग्य है कि वे लोग देवभाषा का स्वाद नहीं चख पाए। मैं ऐसा कहकर किसी विदेशी को संस्कृत के उत्कर्ष में सहयोग की इच्छा नहीं रखती। बल्कि बताना चाहती हूं कि ऐसे विद्वान जो नीर क्षीर में भेद करना जानते हैं जिन्हें ज्ञान की प्यास रहती है। ऐसे लोग अब देश ही नहीं दुनियां में बहुत कम हैं। खास तौर पर भाषा की समृद्ध परम्परा के बारे में जानकारी रखने वालों का अकाल है। आज उपभोक्ता और बाजारवादी संस्कृति ने देवभाषा को अवनति की ओर धकेला है। इसका श्रेय हमारे योग्य नेताओं और नासमझ बुद्धिजीवियों को जाता है। सीजी वाल से एक मुलाकात में बातचीत के दौरान देश की नामचीन व्याकरणाचार्य पाणिनी शोध संस्थान की संस्थापिका पुष्पा दीक्षित ने कहा कि देवभाषा का अर्थ किसी देवता से कदापि नहीं है। अपितु इसका अर्थ ऐसी भाषा जिसे पढ़ने से लोग देवता बन जाते है। कहने का मतलब श्रेष्ठ हो जाते हैं।

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छ्त्तीसगढ़ गौरव और कई मंचों से कई बार सम्मानित पुष्पा दीक्षित ने बताया कि जानवर और मनुष्य में सिर्फ व्यक्त का ही अन्तर होता है। जानवरों के पास व्यक्त करने के लिए भाषा नहीं है और हमारे पास व्यक्त करने के लिए समृद्ध भाषा है। विश्वमंच ने स्वीकार किया है कि दुनियां की सबसे समृद्ध भाषा संस्कृत है। दिल्ली मुम्बई समेत अन्य महानगरों की गलियों में संस्कृत भाषा सीखने के लिए विदेशी नागरिक झोला लटकाए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। संस्कृत भाषा का लाभ उठा रहे हैं। पंडित होने के बाद अपने देश में जाकर सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। उन्हें सम्मान भी मिल रहा है। लेकिन छत्तीसगढ़ के एक मात्र पाणिनी व्याकरण संस्थान की हालत बहुत ही दयनीय है।

सीजी वाल ने जानना चाहा कि आखिर संस्कृत भाषा के पराभाव का क्या कारण हो सकता है। आजादी के पहले और बाद मे संस्कृत भाषा पर क्या कुछ असर रहा। उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा को जितना ज्यादा नुकसान मैकाले से नहीं हुआ उससे कहीं ज्यादा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नीतियों से हुआ है। राजीव गांधी की अंग्रेजी सोच ने संस्कृत को कहीं का नहीं छोड़ा। पुष्पा दीक्षित ने बताया कि नेहरू की उदार नीतियों ने भी संस्कृत को आघात पहुंचाया है। अंबेडकर के प्रस्ताव के बाद भी संस्कृत को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया। जबकि उसी दौर में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय इसराइल में हिब्रु जानने वालों की संख्या मात्र तीन थी। अंग्रेजों की मंशा के विपरीत इसराइल ने मात्र तीन लोगों के दम पर हिब्रू को राष्ट्रभाषा बना दिया। क्या हिन्दुस्तान में ऐसा नहीं हो सकता था।

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सीजी वाल से पुष्पा दीक्षित ने बताया कि आज कुछ स्वार्थियों के इशारे पर देश के कोने कोने में भाषायी विवाद चल रहा है। बिलासपुर भी इससे अछूता नहीं है। कुछ नेता और उससे कहीं ज्यादा छद्म बुद्धिजीवियों ने अपनी दुकान चलाने और पद पाने के लिए हिन्दी बनाम छत्तीसगढ़ी के बीच जंग छेड़ दिया है। मुझे ऐसे लोगों पर शर्म आती है कि क्या उन्हें नहीं पता कि सभी भाषाओं की आत्मा संस्कृत है। चाहे वह सिन्धी, मराठी, मागधी, अर्ध मागधी, शौरसेनी ही क्यों न हो। उन्हें भली भांति पता है कि सभी भाषाओं का जन्म संस्कृत से हुआ है। लेकिन वे संस्कृत भाषा के लिए आवाज नहीं उठा सकते। उन्होंने बताया कि आने वाला समय और भी विभत्स होने वाला है। लोग भाषा के लिए देश को छिन्न भिन्न कर देंगे। यदि इतना मेहनत संस्कृत पर करते तो शायद देश में एकता और अखण्डता को लेकर किसी को चिंता करने की जरूरत ही नहीं होती। इस बात को खुद संविधान निर्माता अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया था।

पुष्पा दीक्षित ने बताया कि पाणिनी शोध संस्थान की उपयोगिता इस बात को लेकर नहीं है कि बिलासपुर के लिए संस्था और मैने क्या योगदान दिया। क्या यह कमाल नहीं है कि हमने बिना किसी सहयोग, शुल्क और सामर्थ्य के बाद भी अपनी भाषा को बचाकर रखा है। यदि मैं यहां नहीं होती तो कहीं और होती। हर साल की तरह कम से कम संस्कृत के पांच विद्वान पैदा करती। यह अभियान आज भी अन्तःसलीला अरपा तट पर चल रहा है। उन्होंने बताया कि पद लोलुप लोगों ने देश और संस्कृत को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। घटिया सोच ने हमर हिन्दुस्तान की जगह,हमर छत्तीसगढ़ की भावना का जहर बोया है। सच्चाई तो यह है कि संस्कृत मानव के सर्वांगीण विकास के साथ उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम को एकीकृत करने का दूसरा नाम है।

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अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए पुष्पा दीक्षित ने बताया कि बिलासपुर तो छोड़िए देश के लोग भी संस्कृत भाषा में दिलचस्पी नहीं रखते हैं। जो आते भी है शान पट्टी और दूसरों पर रौब जमाने के लिए थोड़ा बहुत सीखकर भाग जाते हैं । यहां विदेशी छात्र भी पढ़ने आते हैं। बौद्ध दर्शन का विद्वान चीनी छात्र चाऊ येन जैसा संस्कृत भाषा को सीखने का जज्बा मुझे आज तक बहुत कम लोगों में देखने को मिला। वह पहले गुरू को, फिर भारत भूमि को प्रणाम करता था। आज उसकी गिनती विश्व के माने जाने संस्कृत विद्वानों में होती है। अमेरिका में पेशे से चिकित्सक डॉ.स्वरूप वार्शिंगटन में संस्कृत विद्यालय चलाकर पाणिनी को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं।

पुष्पा दीक्षित ने बताया कि अमेरिका को पहले से ही मालूम था कि आने वाला समय संस्कृत का है। लेकिन भारत को आज तक इस बात का इल्म नहीं है। देर से ही सहीं एक दिन भारत को भी मालूम हो जाएगा कि कम्प्यूटर टेक्नालाजी के लिए सबसे अच्छी भाषा संस्कृत ही है। उन्होंने बताया कि हमारी स्थिति मेमनों के बीच शेर की तरह हो गई है जो भेड़ियों के बीच रहते हुए खुद की शक्ति को पहचान नहीं पाया। और भेड़ियों की तरह व्यवहार करने लगा। अंग्रेजों ने हमारी हालत कुछ ऐसी ही कर दी है। एक दिन आएगा कि हम फिर से विश्वगुरू का तमगा हासिल करेंगे। यह तभी संभव होगा कि हम मंद बुद्धि नेताओं और छद्म विद्वानों की व्यूह रचना से बाहर आएं।

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सीजी वाल से दुख और चिंता जाहिर करते हुए पाणनी शोध सेस्थान के प्रमुख ने कहा कि आज तक संस्थान में बिलासपुर तो क्या छ्त्तीसगढ़ का कोई भी बच्चा संस्कृत पढ़ने नहीं आया। इस बार दो बच्चे जरूर आएं। मेरा प्रयास रहेगा कि इस बीज की मै पूरी जिम्मेदारी के साथ हिफाजत करूं। उन्होंने बताया कि मुझे मंच पर बुलाया तो जाता है लेकिन किसी ने आज तक नहीं पूछा कि पाणिनी व्याकरण है क्या। संस्कृत कैसी भाषा है। इसका विस्तार कैसे किया जाए। मंच पर मुझे मात्र दो तीन मिनट रोककर प्रमाण पत्र और तमगा देकर विदा कर दिया जाता है। सबको मालूम है कि मेरे यहां देश विदेश से लोग संस्कृत का मर्म समझने आते हैं लेकिन प्रदेश के किसी भी नेता या सक्षम व्यक्ति ने कभी जानने का प्रयास नहीं किया कि यहां का संस्थान कैसे चलता है। बावजूद इसके तमाम अर्थाभाव और बुढ़ापे के साथ मैं दुगुने उत्साह और पागलों की तरह अपना काम कर रही हूं।

उन्होंने बताया कि मेरी इच्छा है कि बिलासपुर में अन्य विश्वविद्यालयों की तरह एक पाणिनी व्याकरण को लेकर संपूर्ण शोध संस्थान खुले। लेकिन मुझे किसी ने समय नहीं दिया कि कुछ कह सकूं। अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए पुष्पा दीक्षित ने बताया कि मुख्यमंत्री रमन को मैने बोराभर पत्र लिखा है। लेकिन उन्होंने कभी मिलने का अवसर नहीं दिया। यहां का प्रशासन भी गूंगा बहरा हो गया है।  हमेशा चिंता सताती रहती है कि शमित होते अपनी देवभाषा को कैसे बचाऊं। प्रधानमंत्री मदरसों को एक हाथ में कुरान के साथ कम्प्यूटर की बात कह रहे हैं। क्या उनका ध्यान कभी संस्कृत भाषा की ओर भी जाएगा। कहना अभी जल्दबाजी होगी। पुष्पा दीक्षित ने बताया कि संस्कृत किसी धर्म विशेष की नहीं बल्कि आत्मा की भाषा है। क्या कभी इसे भी वही सुविधा मिलेगी जो अन्य भाषाओं को मिल रही है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन आत्मा की मौत तय है।

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