शिक्षा कर्मी संगठन अध्यक्ष को बदला जाएगा..?हड़ताल के बाद संगठन में दरार,20 साल बाद चुनाव की आई आवाज

BHASKAR MISHRA
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teachers_nehru_chowkबिलासपुर– शिक्षाकर्मियों की बेमुद्दत हडताल..15 दिनों की मुद्दत के बाद खत्म हो गयी। संचालक मंडल के अनुसार बिना शर्तों के शून्य स्थिति में हड़ताल को खत्म किया गया। शायद इतिहास में अपनी तरह का अनोखा हड़ताल है…जिसमें उग्रता भी थी..एजेंडा भी था….जैसा की हड़ताल में होता कि कई लोगों की जान भी गयी…लेकिन वार्ता शून्य स्थिति में खत्म हुई। ऐसी स्थिति में शक का जन्म होना स्वाभाविक है। शक ने संगठन में दरार डालने का काम किया है। यदि 20 साल बाद संगठन का नेतृत्व नए चेहरे के हाथ में जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
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जानकारी मिल रही है कि शिक्षाकर्मी संगठन में आमूल चूल परिवर्तन की तैयारी चल रही है। कोर कमेटी की बैठक भी हो रही है। कुछ बैठकें सार्वजनिक तो कुछ गुपचुप हो रही है। अन्दर से कुछ इस तरह की खबर आ रही है कि स्वयंभू शिक्षाकर्मी नेता को जल्द ही अध्यक्ष पद से किनारे लगाया जाएगा। जोड़ तोड़ और मिलने मिलाने का अभियान जोरों पर है। हड़ताल के बाद नाराज छोटे बड़े और मझोले शिक्षाकर्मी नेताओं ने तो वर्तमान अध्यक्ष के खिलाफ अभियान भी चला दिया है।

नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर शिक्षाकर्मी संगठन के एक नेता ने बताया कि…अभी तक 1 लाख 80 हजार शिक्षाकर्मियों को आकस्मिक तरीके से हड़ताल वापस लेने का कारण समझ मेंं नहीं आया है। इस तरह का हृदय परिवर्तन बहुत कम देखने को मिलता है। लेकिन हम लोगों को पिछले 17 सालों में इस प्रकार का हृदय परिवर्तन तीसरी बार देखने को मिला है। इस बार तो ऐसा लगा कि हड़ताल से जब घर लौटेंगे तो हाथ में कुछ ना कुछ जरूर होगा। ऐसा हुआ भी…नेतृत्व की नादानी ने कुछ साथियों को असमय मौत के मुंह में झोंक दिया…पीठ पर कुछ डंडे और मां बहन को अपमान की पीड़ा लेकर हम घर लौटे।

शिक्षाकर्मी नेता ने बताया कि हमने तीन बार जंगी हड़ताल की। हर बार लगा कि सफल हो रहे हैं। लेकिन तीसरी बार भी वहीं हुआ…जैसा पहले दो बार हो चुका था। सोचने पर मजबूर हैं कि पिछले दो बार की गलतियों से सबक क्यों नहीं लिया गया। यदि ऐसा किया गया होता तो तीसरी बार गलती नहीं होती। जरूरी है  कि अध्यक्ष बदला जाए। नये चेहरों को मौका दिया जाए।

नेता ने बताया कि प्रदेश के एक लाख अस्सी हजार शिक्षाकर्मियों ने फैसला कर लिया है कि चौथी बार गलती नहीं होने देंगे। जरूरत हुई तो नए नेता का चुनाव करेंगे। साल 1997 में शिक्षाकर्मी संगठन का चुनाव हुआ था। निश्चित अंतराल के बाद फिर कभी चुनाव नहीं हुआ। संगठन की असफलता का कारण भी शायद यही है। बीस साल से एक व्यक्ति स्वयंभू नेता है। शिक्षाकर्मियों में देखते ही देखते 12 संगठन खड़े हो गये। इस बार ऐसे अध्यक्ष का चुनाव होगा जो 12 संगठनों को एक छतरी के नीचे खड़ा कर सके। लेकिन वर्तमान अध्यक्ष ना बने।

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