NTPC की दादागिरी..विस्थापितों को याद आए बद्रीधर..1 दशक बाद भी नही मिली नौकरी..चक्कर काट रहे किसान

बिलासपुर—एक दशक से अधिक समय हो चुका है… एलटीपीसी ने किसानों से किया वादा आज तक पूरा नहीं किया है। किसानों में नाराजगी तो है लेकिन उनमें अब प्रबंधन से लड़ने का माद्दा लगभग खत्म हो चुका है। उनके समर्थन में ना ही कोई संगठन खड़ा हो रहा है और ना ही कोई नेता। यही कारण है कि निराश विस्थापित किसानों को आज पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान की याद सताने लगी है।

                बताते चलें कि एनटीपीसी सुपर थर्मल क्रिटिकल पावर केन्द्र निर्माण के समय सीपत के किसानों से नौकरी और मुआवजा देने के शर्तों पर जमीन अधिग्रहण किया गया। प्रबंधन ने कम्पनी खड़े होने के बाद 692 में अब तक कई जंग लड़ने के बाद मात्र 390 लोगों को ही रोजगार दिया। इसके लिए भी स्थानीय विस्थापितों को कई बार सड़क से टेबल तक संघर्ष करना पड़ा। 

                  इस संघर्ष में खासकर छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष की भूमिका हमेंशा महत्वपूर्ण रही। जब तक बद्रीधर दीवान ने अधिकारियों के साथ बैठकर तल्ख भाषा में शर्तों के साथ रोजगार देने को कहा। काफी दबाव के बाद एनटीपीसी प्रबंधन को रोजगार देने को मजबूर होना पड़ा है। मजेदार बात है कि बद्रीधर दीवान के सख्त निर्देश के बाद भी एनटीपीसी प्रबंधन ने कई बार नियमों की बधाएं  पैदा की। बावजूद इसके बद्रीधर दीवान के सामने उनकी नहीं चली। आज बद्रीधर दीवान 94 साल के हो चुके है। सक्रिय राजनीति से भी दूर है। यही कारण है कि आज  विस्थापित पीड़ित किसानों को वह बहुत आ रहे है। क्योंकि विस्थापितों के साथ आज ना तो कोई संगठन ही खड़ा है। और ना ही कोई नेता या विधायक।

 दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय         

                एक पीड़ित किसान ने बताया कि जमीन अधिग्रहण करते समय आरक्षण जैसी कोई बात नही थी। लेकिन साल 2008 में प्रबंधन ने तात्कालीन मुंगेली प्रशासन से मिली भगत कर एक बैठक में आरक्षण का मामला सेट कर लिया। इस निर्णय के बाद ही हम सबको पता चल गया  कि एनटीपीसी प्रबंधन नौकरी देने से बचना चाहता है। क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि कुल पद 692 में से 154 पद आरक्षित रहेगा। जबकि विस्थापितों में पचास से अधिक लोग भी आरक्षित जातियों में शामिल नहीं है। 

कुशल अकुशल नाम पर बद्रीधर दीवान का तेवर

               एनटीपीसी प्रबंधन के खिलाफ लगातार आंदोलन के बाद त्तात्कालीन समय कलेक्टर कार्यालय स्थित मंथन सभागार मे त्रिपक्षीय बैठक हुई थी। बैठक में स्थानीय विधायक बद्रीधर दीवान ने भी शिरकत किया। उसी दौरान काफी दबाव के बाद तात्कालीन प्रबंधन ने जमीन विस्थापितों को चतुर्थ वर्ग कर्मचारी के रूप में भर्ती का वादा किया। इतना सुनते ही दीवान ने स्पष्ट किया कि जमीन मालिक चपरासी या फर्रास बनने के लिए जमीन नहीं दिया है। सबसे पहले जमीन विस्थापितों के लिए प्रशीक्षण का प्रबंधन किया जाए। इसके बाद उन्हें सम्मानित तरीके से नौकरी दी जाए। अन्ततः प्रबंधन को झुकना पड़ा था। लेकिन बद्रीधर दीवान के राजनैतिक निष्क्रियता के बाद मामला आज भी लिंगाराम बना हुआ है।

 क्यों नहीं रही भर्ती..प्रबंधन का नया बहाना   

               अन्दर सूत्रों की माने तो एनटीपीसी प्रबंधन ने जानबूझकर ना कुशल कारीगरों को नौकरी दे रहा है। और ना ही अकुशल को ट्रेनिंग की व्यवस्था कर रहा है। सूत्र ने बताया कि प्रबंधन सबसे पहले अपने कर्मचारियों को प्रमोशन देना चाहता है। इसके बाद ही कुछ खाली पदों पर विस्थापितों में से पांच दस लोगों को ही नौकरी देना चाहता है। बाकी पद अपने या अपनों के नाम बंधक बनाकर रखा है। इस खबर के बाद किसानों में गहरा आक्रोश है।

 किसानों और पीडितों को बैठक का इंतजार

                  बहरहाल बद्रीधर दीवान के यादों के बीच पीड़ितों ने बताया कि प्रशासन के साथ प्रबंधन फरवरी में त्रीपक्षीय बैठक का आश्वासन दिया है। इसके पहले जनवरी 2020 में हुए त्रिपक्षीय बैठक के दौरान तात्कालीन कलेक्टर डॉ.अलंग ने एनटीपीसी को स्प्षट निर्देश दिया था कि  सभी का नाम प्रशीक्षण के लिए फायनल किया जाए। एक महीने के अन्दर प्रशीक्षित लोगों को नौकरी पर रखा जाए। आज एक साल हो चुके है। लेकिन एनटीपीसी प्रबंधन का एक साल पूरा नही ंहुआ है। देखते है कि फरवरी में त्रिपक्षीय बैठक होती है या नहीं।

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