राज्यसभा चुनाव का अजब गणित: उत्तर छत्तीसगढ़ के हिस्से में “जीरो बटा सन्नाटा” क्यों है भाई..?

( गिरिज़ेय ) छत्तीसगढ़ में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी के “आलाकमान” ने किस पैमाने को सामने रखकर राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम तय किए हैं….? इस सवाल का जवाब तो शायद वहीं से मिल सकता है। लेकिन ख़ासकर उत्तर छत्तीसगढ़ का इलाक़ा अभी भी इस सवाल का ज़वाब़ तलाश रहा है कि इस इलाक़े को लम्बे अरसे के बाद राज्यसभा सदस्य विहीन क्यों कर दिया गया..? औऱ अब़ इसकी भरपाई कैसे होगी….? बिलासपुर ,रायगढ़ और सरगुज़ा के इस इलाक़े को बरसों पहले से ही राज्यसभा में नुमाइंदगी का मौक़ा मिलता रहा है। कई बड़े चेहरे इस इलाक़े से राज्यसभा में जाते रहे हैं। लेकिन नए चुनाव के बाद उत्तर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा।

इतिहास के पिछले पन्नों को खंगाले तो बिलासपुर , रायगढ़, सरगुजा को राज्यसभा में अभाजित मध्यप्रदेश में भी समय-समय पर प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। जबकि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी इस इलाक़े के कई नेता राज्यसभा में जाते रहे। जाने-माने साहित्यकार और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव रहे श्रीकांत वर्मा भी बिलासपुर के ही थे और वे 1976 और 1982 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे । उनके निधन के बाद उनकी पत्नी श्रीमती वीणा वर्मा ने 1986 ( उपचुनाव), 1988 और 1992 में राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल की थी । कांग्रेस के कद्दावर नेता और छत्तीसगढ़ के पहले मुख़्यमंत्री अजीत जोगी ने भी 1986 और 1992 मे दो बार राज्यसभा में प्रतिनिधित्व किया ।

रायगढ़ के कांग्रेस नेता जगतपाल सिंह सत्तर-अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के करीब़ी नेताओं में माने जाते रहे। उन्होने भी 1984 में राज्यसभा चुनाव में ज़ीत हासिल की थी । भगतराम मनहर का नाम छत्तीसगढ़ में अनुसूचित वर्ग से कांग्रेस क़े बड़े नेताओं में शुमार रहा है। उन्होने 1978,1984 और फ़िर 2000 में राज्यसभा में प्रतिनिधित्व किया । उनके आकस्मिक निधन के बाद उनकी पत्नी श्रीमती कमला मनहर भी राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुईं थीं। 1980 में कांग्रेस ने सरगुजा इलाक़े से प्रवीण प्रज़ापति को राज्यसभा भेजा था ।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद बिलासपुर के कांग्रेस नेता रामाधार कश्यप राज्यसभा के लिए चुने गए थे । बीजेपी से भी उत्तर छत्तीसगढ़ इलाक़े क़े कई नेताओं को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का मौक़ा मिल चुक़ा है। अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में लखीराम अग्रवाल की गिनती बीजेपी के बड़े नेताओं में होती रही । उन्होने भी 1990 और 1996 में दो बार राज्यसभा में प्रतिनिधित्व किया । बीजेपी नेता गोविंदराम मिरी 1994 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे ।

बीजेपी के लोकप्रिय नेता दिलीप सिंह जूदेव राज्यसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। राज्यसभा सांसद के रूप में वे अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रहे। भाजपा के ही कद्दावर आदिवासी नेता नंदकुमार साय भी राज्यसभा के लिए चुने जा चुके हैं। बीजेपी ने जशपुर राज परिवार के रणविजय सिंह ज़ूदेव को भी राजयसभा भेजा था । 2016 में बीजेपी के रामविचार नेताम राज्यसभा के लिए चुने गए थे। उनका कार्यकाल जून में पूरा हो रहा है।

रामविचार नेताम का कार्यकाल पूरा होने पर लम्बे अरसे के बाद ऐसी तस्वीर बन रही है कि उत्तर छत्तीसगढ यानी बिलासपुर –रायगढ़ा – सरगुजा इलाक़े से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा। जिस इलाक़े से एक ही समय में एक से अधिक नेता राज्यसभा में रहें हैं और जिनकी वज़ह से उच्च सदन में उत्तर छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व मिलता रहा , उस इलाक़े को काफ़ी अरसे के बाद यह दौर देखना पड़ रहा है। इस बार भी राज्यसभा के लिए टिकट के फैसले के समय इस इलाक़े से कांग्रेस के कई दावेदारों के नाम सामने आए थे ।

लेकिन आलाकमान ने उत्तर छत्तीसगढ़ … क्या पूरे छत्तीसगढ़ को तरज़ीह नहीं दी। राष्ट्रीय स्तर पर भी टिप्पणीकार कांग्रेस पार्टी के इस फ़ैसले को सवालों के घेरे में रख रहे हैं। सोशल मीडिया पर चल रही बहस में सुना जा सकता है कि लोगों ने इसे कांग्रेस का आत्मघाती कदम क़रार दिया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पार्टी के चिंतन शिविर से कुछ भी निकल कर नहीं आया । अलबत्ता इस तरह के फ़ैसले से “आलाकमान” ख़ुद होकर छत्तीसगढ़ को भी उसी रास्ते पर ढ़केलने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है, जिस रास्ते पर चलकर कांग्रेस दूसरे राज्यों में अपने “नए मुक़ाम” पर पहुंच गई है।

ख़ासकर जब अगले साल यानी 2023 में छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, ऐसे समय में इस तरह के कदम को लोग हैरत से भी देख रहे हैं …। और आलाकमान की “पैनी नज़र” पर सवालिया निशान भी लगाए ज़ा रहे हैं। हालांकि जिस तरह से हाल के यूपी चुनाव में करारी हार के बाद भी यूपी के नेताओं को राजस्थान और महाराष्ट्र से राज्यसभा भेजे जाने का गणित भी अभी लोगों को समझ में नहीं आ रहा है।उसी तरह छत्तीसगढ़ के बाहर से दो नेताओँ को छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में भेजे जाने की ख़बर के बाद यहां भी गणित का यह सवाल कठिन हो गया है। अंक गणित-बीज गणित और रेखा गणित में उलझी कांग्रेस पार्टी किस समीकरण से अपना यह सवाल हल कर पाएगी , यह बताना भी अभी उतना ही कठिन है। लेकिन “उत्तर छत्तीसगढ़” के हिस्से में गणित का यह “उत्तर” फ़िलहाल तो “शून्य बटे सन्नाटा” ही आ रहा है….।

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