सरकार का कार्यकाल आधे सफर के करीब,पढ़िये नोकझोक के माहौल मे कैसे शुरू हुआ,हिसाब-किताब का दौर

(रुद्र अवस्थी)वक्त तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। अब आने वाले गिनती के चंद दिनों में वक्त का ऐसा मुकाम सबके सामने होगा , जब प्रदेश की मौजूदा सरकार अपने कार्यकाल का आधा सफर तय कर चुकी होगी। जाहिर सी बात है की अब यह हिसाब -किताब लगाने का वक्त धीरे – धीरे सामने आ रहा है कि इस सरकार ने क्या कुछ हासिल किया और खासकर जिन वादों के सहारे बड़ी बहुमत के साथ लोगों ने इस सरकार को गद्दी पर बिठाया था ,उनमें से कितने वादे पूरे हुए और कितने वादे अभी पाइपलाइन में हैं या उन पर अब तक कोई काम भी शुरू नहीं हो सका है…… ? इस तरह के हिसाब – किताब के दौर की एक झलक छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी पंचायत में भी देखने को मिली। जहां जन घोषणा पत्र के मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष आमने -सामने दिखाई दिए। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने यह सवाल उठाया कि यह सरकार जन घोषणा पत्र को आत्मसात करने की बात कहती है तो अब तक उसमें से कितने वादे पूरे किए जा चुके हैं…. ?  उनकी ओर से यह सवाल भी उठाया गया  कि सदन में 25 वादे पूरे करने की बात कही गई थी ।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि 24 वादे पूरे हुए हैं। जबकि घोषणा पत्र समिति के अध्यक्ष के मुताबिक 13 वादे पूरे किए गए हैं। अब सरकार की ओर से जवाब आया है कि 14 वादे पूरे कर दिए गए हैं। नेता प्रतिपक्ष यह जानना चाह रहे थे कि इन संख्याओं में से कौन सी संख्या सही है  और वे अब तक पूरे किए गए वादों का ब्यौरा भी चाह रहे थे। इस मुद्दे पर तीखी बहस और नोकझोंक का माहौल बना। सीएम भूपेश बघेल ने जोर देकर कहा कि 15 साल बीजेपी के कुशासन से प्रदेश की जनता त्रस्त हो चुकी थी और सभी तबके के लोगों ने कांग्रेस को जनादेश दिया। उन्होंने किसानों की कर्ज माफी, ढाई हजार रुपे क्विंटल में धान खरीदी ,आदिवासियों की जमीन वापसी जैसे काम गिनाए। जवाब में नेता प्रतिपक्ष को फिर पूछना पड़ा कि मुख्यमंत्री पांच की गिनती पर ही आकर अटक गए। वे फिर से इस बात पर जोर देते रहे कि अब तक पूरे किए गए सभी वादों की सूची सामने आनी चाहिए। नोकझोंक और शोर-शराबे के बीच यह बात भी उठी कि भाजपा भी अपने कितने वादे पूरा करती रही है। प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत में हुई इस बहस के बाद चाहे घोषणापत्र के वादों पर अमल की सही तस्वीर सामने आ सकी या नहीं ……?  और प्रदेश का विपक्ष , सरकार की दलील से किस हद तक संतुष्ट हो सका…… इस पर सभी की अपनी-अपनी राय हो सकती है। लेकिन वास्तविक सच्चाई तो इस सूबे के अवाम को ही मालूम है। आईने की तरह सारा सच जिसके सामने है और वक्त आने पर अवाम ही यह फैसला दे सकेगा की कितने वादे पूरे हुए। वह अपने फैसले में यह भी बताएगा कि छत्तीसगढ़ की सरकार और विपक्ष की दलील से वह कितना संतुष्ट है ।

हादसों से उठ रही चीख़ों के बीच सत्ता औऱ विपक्षी नेताओँ के सुर एक होने को मज़बूर..

सियासत में सत्ता और विपक्ष के बीच की लकीर को देखने के आदि हो चुके लोगों को कभी – कभी यह लकीर धुंधली होती भी दिखाई दे जाती है। इसे इत्तेफाक कहे या कुछ और हाल के दिनों में बिलासपुर के एक बड़े भाजपा नेता ने बिलासपुर में सत्ता पक्ष के लोगों के संरक्षण में अपराध और अवैध काम कराए जाने का आरोप खुलकर लगाया था। इसके कुछ दिन के भीतर ही बीजेपी नेता  के कट्टर विरोधी कांग्रेस के एक बड़े नेता ने शहर में रेत का अवैध परिवहन करते हुए ट्रैक्टर की चपेट में आने से एक स्कूली बच्चे को मौत के बाद ,जिस तरह की नाराजगी के साथ अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की। उस पर भी लोगों ने गौर किया और शहर के हालात को लेकर सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि अगर विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही सिस्टम से नाखुश हैं तब तो हालात बदतर ही कहे जा सकते हैं ।कांग्रेस नेता ने पूरी ज़ानकारी लेकर आँदोलन करने की बात भी कह डाली । मीडिया में भी लगातार खबरें आ रही हैं कि अरपा नदी से रेत का गैरकानूनी परिवहन करने वाले रसूखदार लोगों की भारी गाड़ियों की चपेट में आने से अब तक कितने ही लोग अपनी जान गवां चुके हैं । जब भी ऐसा हादसा होता है लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है। लेकिन फिर जैसे ही मुक्तिधाम की आग ठंडी पड़ती है…… मनमानी फिर से शुरू होकर चरम पर पहुंच जाती है। हाल ही में ट्रैक्टर हादसे में एक स्कूली बच्चे की दर्दनाक मौत के बाद व्यवस्था के ज़िम्मेदार लोगों ने अब तक जो कुछ किया है, उससे कम-से-कम शोक संतप्त परिवार को तो संतुष्टि नहीं ही मिल पाई है। हां….. यह बात ज़रूर सामने आई गई कि रेत की चोरी करने वाले  लोग ऐसे रास्तों की तलाश करते हैं, जहां उन पर कोई निगरानी नहीं रखी जा सके। अधिक से अधिक रेत ढुलाई की होड़ में वे अपनी भारवाहक गाड़ी की रफ्तार को काबू में नहीं रख पाते और सामने से गुजर रहा कोई भी शख्स उनके इस अवैध कारोबार की ख़ूनी रफ्तार  की चपेट में आकर सड़क के ऊपर हाड़ – मांस के चीथड़ों में तब्दील हो जाता है। इस ताजा हादसे के बाद शहर के पत्रकारों ने सत्ता पक्ष के कई नेताओं के सामने यह सवाल उठाया और जानना चाहा कि आखिर मौत बनकर फ़र्राटेदार –  खूनी रफ्तार में सड़क पर दौड़ रही इन गाड़ियों पर क्या कभी  ब्रेक लग पाएगा। कई घर उजाड़ने और मातम का संदेश देने के बाद भी बदस्तूर जारी रेत के इस खेल में कौन लोग शामिल हैं…….  ? और क्या पूरा सिस्टम ही मिला हुआ है……. ?  इस सवाल का जवाब पूरा शहर ज़ानना चाह रहा है । लेकिन जिस जगह पर सूबे के दूसरे सबसे बड़े शहर का पूरा प्रशासन बैठता है । उसकी कुछ दूरी पर ही चल रहा यह खेल सोचने पर मजबूर करता है कि पहले विपक्ष के नेता और अब सत्ता दल के नेता की ओर से यह बात उठाए जाने के बाद भी व्यवस्था के जिम्मेदार लोग न कुछ सुन पा रहे हैं और न देख पा रहे हैं……।  या देख कर भी अनजान है …….. और सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। समझना आसान है कि इसमें से कौन सा विकल्प सबसे सही है। लेकिन अगर हालात नहीं सुधरे तो यह सवाल भी जवाब की तलाश करता रहेगा की रेत कारोबारियों की इस खूनी रफ्तार की भेंट चढ़ने वालों में अभी और कितने नाम जुड़ेंगे….. ?

टूरिज़्म से ही बदल सकते हैं गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही के हालात

करीब साल भर पहले अस्तित्व में आए गौरेला –पेंड्रा- मरवाही जिले में नेतृत्व के साथ ही रोजगार को लेकर भी बड़ा संकट दिखाई दे रहा है। जंगल ,पहाड़ ,नदी, नालों से घिरे इस इलाके में विकास के नाम पर अब तक चाहे जो कुछ भी हुआ हो। लेकिन ऐसी कोई पहल दिखाई नहीं देती जिसका रिश्ता उस इलाके के लोगों को रोजगार मुहैया कराने से हो। आसपास इलाके का सेंटर होने की वजह से यहां छोटे – मझोले किस्म के कारोबार तो चलते हैं। जिसके जरिए कारोबारियों का जीवन बसर होता है। लेकिन आस पास न तो कोई बड़ा उद्योग है और न ही ऐसे किसी कामकाज की उम्मीद नजर आती है । जहां गौरेला-  पेंड्रा -मरवाही इलाके के नौजवानों को अपने ही माहौल में काम मिल सके। इस इलाके को कुदरत ने इतना कुछ दिया है कि इसके जरिए टूरिज्म का विकास कर लोगों को प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराया जा सकता है । अमरकंटक की वादियों से लगे इस इलाके में कई  ऐसी जगह है जो प्राकृतिक, धार्मिक ,पिकनिक स्पॉट जैसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकते हैं। अमरकंटक जाने के लिए लोगों को पेंड्रारोड रेलवे स्टेशन पर ही उतरना पड़ता है। और अमरकंटक के साथ इस इलाके का गहरा जुड़ाव बना हुआ है। यदि गौरेला –पेंड्रा- मरवाही इलाके के प्राकृतिक स्थानों को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो यहां एक बेहतर टूरिज्म सर्किट बन सकता है। हाल ही में जब डोंगरगढ़ में प्रशाद योजना के तहत मां बमलेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़ विकास परियोजना का भूमि पूजन हुआ तो वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए इसमें शामिल हुए केंद्र सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल से मुखातिब होकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस सिलसिले में एक अच्छा मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि प्रशाद योजना के तहत अमरकंटक की स्वीकृत विकास परियोजना में छत्तीसगढ़ के कबीर चबूतरा, राजमेरगढ़ और उस इलाके के शिव मंदिरों को भी शामिल किया जाना चाहिए। वैसे भी अमरकंटक से लगे हुए छत्तीसगढ़ के इस हिस्से में कई  पुराने मंदिर और ऐतिहासिक स्थल शामिल है। टूरिज्म के नजरिए से इस इलाके का विकास होता है तो रोजगार के लिए भी यह नौजवानों के लिए बहुत बड़ा सहारा हो सकता है। सीएम भूपेश बघेल की इस पहल से इलाके के लोगों की उम्मीद तो बंधी है। लेकिन सही मायने में उन्हें मदद तभी मिल पाएगी ,जब यह सपना जमीन पर भी साकार हो सके। वैसे भी कोरोना काल में लॉकडाउन के बाद से पेंड्रारोड स्टेशन पर छाई विरानी और अमरकंटक जाने वाले पर्यटकों की संख्या में आई भारी कमी के चलते वहां का कारोबार भी प्रभावित हुआ है और पर्यटन विकास जैसे विकल्पों पर लोग ऐसी पहल की उम्मीद कर रहे हैं जिसका नतीजा भी सामने आ सके ।

सब ठीक-ठाक है…… तो क्यूं पड़े क्रेशर उद्योग पर ताले

कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर है…….. ।  हम तरक्की कर रहे हैं………। सभी लोग अपने अपने क्षेत्र में बेहतर काम कर रहे हैं और शांति व्यवस्था बनी हुई है……। अगर कोई इस तरह का दावा करें तो उसे हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर दिखा कर पूछा जा सकता हैं कि इस तस्वीर के बारे में  अब उनका क्या कहना है ……. ? सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस तस्वीर में मस्तूरी क्रेशर उद्योग संघ जिला बिलासपुर की ओर से एक इश्तहार नुमा सूचना दी गई थी। जिसमें तीन बार लाल और बोल्ड अक्षरों में बंद… बंद… बंद… लिखते हुए आगे यह भी बताया गया था कि मस्तूरी तहसील क्षेत्र के कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा गुंडागर्दी, धमकी, मारपीट ,अभद्र व्यवहार कर अवैध वसूली के विरोध में अनिश्चितकाल के लिए खदान क्रेशर का कार्य बंद किया जाता है। इसके बाद उस इलाके की खदानें बंद कर दी गई । एक रिपोर्ट के मुताबिक मस्तूरी इलाके के कोसमडीह, मोहतरा, खैरा, जयरामनगर और भदौरा गांव में 40 चूना पत्थर खदान है। जहां करीब 25 की संख्या में क्रेशर लगे हुए हैं। जिनमें चालक, परिचालक, मशीन ऑपरेटर और मजदूर को मिलाकर करीब एक हज़ार लोग रोजाना काम करते हैं। खदानें बंद होने से सभी के काम ठप हो गए। इस मामले में क्रेसर उद्योग संघ ने मस्तूरी एसडीएम को पंचायत प्रतिनिधियों / जनप्रतिनिधियों द्वारा खनिज पट्टेदारों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बदसलूकी किए जाने की शिकायत की गई थीकई दिनों तक ख़दान बंद रहने के बाद  प्रशासन ने दोनों पक्षों को बुलाकर बातचीत की और आपस में सुलह कराया। दोनों पक्षों ने इस बात पर लिख़ित में सहमति दी है कि एक दूसरे का सम्मान करते हुए बिना वाद विवाद के प्रशासन के खनिज उत्खनन संबंधी गाइडलाइन के अनुरूप काम करेंगे । इस सुलह के बाद क्रेशर उद्योग फिर से शुरू करने का रास्ता खुल सका। अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह इस जिलें में चल रहे सिस्टम का एक नमूना है, जो अती के अँत के रूप में सामने आ गया ……. और पता नहीं ऐसे कितने नमूने होंगे, जिसका किसी को पता ही नहीं है…..। अब किससे पूछा जाए कि  यदि क्रेशर उद्योग चलाने वाले लोग अपने ही नुमाइंदों के खिलाफ बदसलूकी की शिकायत करते हैं और नौबत क्रेशर उद्योग बंद करने तक पहुंच जाती है तो आखिर इस तरह के हालात क्यों पैदा हो रहे हैं…… ?  यह सवाल भी माकूल जवाब का इंतजार कर रहा है कि क्या जनता के बीच से चुने गए नुमाइंदे और प्रशासन में बैठे लोगों के रवैये में कहीं कोई ऐसी ख़ामी ज़रूर है कि हजार की तादाद में लोगों को काम बंद कर घर पर बैठना पड़ता है। चाहे जनप्रतिनिधि हो या अफसर ……नीचे से लेकर ऊपर तक सभी इस सवाल से घिरे हुए दिखाई दे रहे हैं। अब देखना यह है कि वहां दोबारा बंद जैसे हालात फिर ना हो……  इसके लिए कोई ठोस पहल कब तक सामने आएगी….. या कभी नहीं आएगी……?

कोरोना की आहट…. बचाव ही उपाय

कोरोना  एक ऐसा शब्द है……. जो पिछले करीब साल भर से लोगों को रह-रहकर डराता रहा है। याद कर लीजिए गुजरे साल 2020 के इन्हीं दिनों की ……. महीना यही था। और तारीख भी इसके ही आसपास रही होगी। जब कोरोना के दस्तक दी थी। कोई नहीं भूलेगा कि उसके बाद तालाबंदी के दौर में किस तरह लोगों के दिन गुजरे। किस तरह सब कुछ ठप्प हो गया। कई बार लगता था कि क्या इस हालात से कभी उभर नहीं पाएंगे….. ? हालांकि वक्त के साथ बदलाव भी हुआ और अंधेरे  कुहासे के बीच उम्मीद की किरणें भी नजर आने लगी। लेकिन करीब-करीब ठीक 365 दिन गुजरते – गुजरते एक बार फिर कोरोना की आहट सुनाई देने लगी है। यह सब याद करने के पीछे किसी को डराने का मकसद नहीं है। लेकिन जिस तरह पड़ोस के सूबे महाराष्ट्र में रोजाना पॉजिटिव केस की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है। छत्तीसगढ़ से सटे नागपुर इलाके में लॉकडाउन लगा दिया गया है। छत्तीसगढ़ में भी रोज़ाना दर्ज होने वाले पॉजिटिव केस  का आंकड़ा साढ़े चार हजार के करीब तक पहुंच गया है। प्रदेश के दो मंत्री, विधायक , कलेक्टर भी हाल के दिनों में कोरोना पॉजिटिव की गिनती में आ चुके हैं। कई स्कूलों में बच्चे और शिक्षक भी कोरोना संक्रमित पाए जा रहे हैं। जिससे प्रभावित  स्कूल को बंद करने का आदेश भी जारी हो रहा है। ऐसे में एक बार फिर सावधानी को लेकर सख्त होना पड़ेगा। अभी भी मास्क पहनने से लेकर सारे एहतियात बरतने की सख्त जरूरत है। वक़्त हमें यह तो सिख़ा ही गया है कि  गुजरे साल के माहौल में हम फिर न लौटे इसके लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ एहतियातन का पालन करना  ही एक अदद उपाय है । यही समय की मांग भी है।

अब किसके हिस्से में आएगी……. ? धान की सियासी फ़सल

धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख फसल है। और पिछले कुछ अर्से से धान के जरिए सियासत की फसल बोने और काटने का सिलसिला भी लोग देख रहे हैं। इस सूबे में धान खरीदी का मुद्दा बड़ी आबादी  पर अपना असर डालता है। लोगों ने यह भी देखा कि 2018 के पिछले चुनाव  के नतीज़े पर इस मुद्दे का कितना असर हुआ था। प्रदेश की मौजूदा सरकार का दावा है कि वह किसानों के हित में काम कर रही है और अपने वादे के मुताबिक धान की खरीदी कर रही है। धान का पैसा किसानों के खाते में जमा भी समय पर हो रहा है। हालांकि प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी को यह सवाल भी उठाने का मौका मिल जाता है कि बोनस के रूप में मिलने वाली अंतर की राशि किसानों को एक साथ और सही समय पर नहीं मिल पाती । पिछले साल के बोनस का भुगतान अब तक नहीं हो सका है। ऐसे में इस साल का बोनस कब तक मिलेगा यह कहना कठिन है। वैसे धान के मुद्दे पर कांग्रेस –  भाजपा दोनों एक दूसरे पर हमलावर नजर आते हैं। दलीलें दोनों के पास हैं। मसलन कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों का कहना है कि उन्होंने वादे के मुताबिक धान की खरीदी कर ली है। लेकिन सेंट्रल पुल से चावल का कोटा कम कर दिया गया है। जिससे दिक्कतें आ रही हैं और इसी वजह से रिकॉर्ड तोड़ खरीदे गए धान की बिक्री के लिए टेंडर जारी किए गए हैं। जिसमें को-ऑपरेटिव सोसायटियों की ओर से खरीदा गया धान काफी कम कीमत पर बेचा जाएगा। सरकार में बैठे लोग कहते हैं कि किसानों के लिए सरकार यह घाटा सहने को तैयार है।  लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी के लोगों का दावा है कि सेंट्रल पूल में चावल खरीदने का कोटा केंद्र सरकार ने 42 लाख मैट्रिक टन से बढ़ाकर साठ लाख मैट्रिक टन कर दिया है। लेकिन प्रदेश की सरकार बहानेबाजी कर रही है । किसानों को बारदाना के नाम पर भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। भाजपाई दावा करते हैं कि धान खरीदी से सरकार को नुकसान की बजाय फायदा हो रहा है । फिर भी वह लोगों के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है। सूबे का किसान मेहनत कर धान की रिकॉर्ड पैदावार कर रहा है और अपने हिस्से का धान बेच भी रहा है। लेकिन धान के नाम पर सियासत की फसल किसके हिस्से में आएगी यह समझना अभी कठिन है। क्योंकि यदि छत्तीसगढ़ के किसी गांव में किसी किसान से यह सवाल करेंगे तो शायद यह जवाब भी मिल सकता है कि किसानों के सामने धान खरीदी के अलावा और भी समस्याओं का अंबार है। उस पर कोई बात करेगा क्या …… ?

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