परसा कोल ब्लॉक : पेड़ कटाई का सोशल मीडिया में विरोध, पढिए मार्मिक पोस्ट… कैसे उजड़ जाएगा सरगुजा, सूरजपुर, कोरबा का जंगल..? और हमसब मौन क्यों हैं..?

क़ोयला ख़दान के नाम पर सरगुजा-सूरज़पुर – कोरबा इलाके में करीब साढ़े आठ सौ हेक्टेयर जंगल की कटाई की चर्चा इन दिनों सोशल मीडिया पर भी बनी हुई है। छत्तीसगढ़ के लोग इस सिलसिलें में लगातार लिख रहे हैं और पेड़ों की कटाई का विरोध भी कर रहे हैं। जिसमें प्रमुख़ बात यह है कि पूरे छत्तीसगढ़ के लोगों को इसका विरोध करना चाहिए। चूंकि अगर इस मसले से ख़ुद को अलग कर मौन हो गए तो पेड़ कटेंगे और आने वाली पीढ़ी को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि पेड़ काटने वाले यह भूल रहे हैं कि उन्होने पेड़ नहीं लगाए हैं।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर जो कुछ लिख़ा ज़ा रहा है उसे हम यहां पर साभार / जस- का-तस शेयर कर रहे हैं।

हमारे पत्रकार साथी वैभव पाण्डेय ( वैभव बेमेतरिहा ) ने इस मुद्दे पर कुछ लाइनें लिखीं हैं, जो सभी को अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास कराती है…

लिखा जाएगा हम सबका अपराध

मौन रहकर विनाश देखते रहे,

अपने ही घर में अपनों का

हम ज़िंदा लाश देखते रहे।।

क्षमा  हसदेव_अरण्य

फ़ेस बुक़ में सरगुजा भूषण नामक पेज़ पर एक मार्मिक पोस्ट शेयर की गई है। इसमें भी  सभी को ज़िम्मेदारियों का अहसास कराते हुए याद दिलाया गया है कि क्या इत़नी ज़ल्दी ही भूल गए कि एक साल पहले ही ऑक्ज़सीन सिलेंडर के लिए मारामारी मची हुई थी ….

सरगुजा भूषण की पोस्ट

छत्तीसगढ़ के फेफड़ा” कहे जाने वाले हसदेव अरण्य (सरगुजा, सूरजपुर,कोरबा) का लगभग 841 हेक्टेयर जंगल जल्द ही साफ़ कर दिया जाएगा।
क्योंकि सरकार और कोयले के बीच कमबख्त जंगल बीच में आ गया है उसको तो कटना ही है ना। क्या हुआ? सिर्फ 2 लाख पेड़ ही तो हैं फ़िर से लगा लेंगे।
तो क्या ये जंगल सरकार और पूंजीपतियों के बाप की है? उनके पूर्वजों ने ये सारे पेड़ लगाए थे? क्या कभी वो खुद हसदेव आए हैं कभी देखा है किसी एक पेड़ को ध्यान से? कागज़ों पर पेड़ काटने से पहले बेहतर होता, हसदेव आकर एक बार देख जाते। अच्छा क्या जंगल के कटने से सिर्फ़ पेड़ मरते हैं? वृक्षों और पशुओं की कितनी सारी प्रजातियां विलुप्त हो जाएँगी। हाथियों का घर है हसदेव आप उनके घर बर्बाद कर दोगे तो वो आपके घर आ जाएँगे और ये आप बर्दाश्त नहीं कर पाओगे।
हसदेव अरण्य क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी उनका क्या?

उनका तो घर, जीविका, माँ-बाप, बच्चें, भगवान सब कुछ हसदेव ही है वो कहाँ जाएँगे? अपने पशु वो कहाँ चराएंगे? अपने पर्वों में कहाँ से लाएँगे वो वन देव और वन देवी? कैसे सिखाएँगे अपने आने वाले बच्चों को अपनी संस्कृति, जंगल के बिना आदिवासी का क्या अस्तित्व बाकी रह जाएगा? उनके बच्चें जिन्होंने ज़िंदगी भर अपने माँ बाप को जंगल के बीच देखा अब उन्हें जंगल के लिए संघर्ष करते देख रहे हैं। उनके मन में आपके लिए घृणा बढ़ती जा रही और आप उसी के लायक है।
एक बात बताइए हसदेव क्या सिर्फ़ आदिवासियों का है? आपका कुछ नहीं? आज से ठीक एक साल पहले लोग घर बेच कर ऑक्सीजन सिलेंडर ले रहे थे याद है या भूल गए? मध्य भारत का एक सघन वन कटने जा रहा और आपको लगता है कि आपको इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा?

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